पहेलियों में पलते हैं ज़िंदगी की .

पहेलियों में पलते हैं हम ज़िंदगी की ।
रोज़ एक नई राह चुनने को बेक़रार,
पीछे छोड़ आए हैं कितने ही यार ।

कुछ कुचल कर गए दिल को,
कुछ दे गए अपनी ताक़त ।
आज भी बैठे सोचते हैं ,
कैसी थी वो उनकी चाहत ।

अभी अभी तो वक़्त को मुट्ठि में थामा था ।
अभी अभी तो बचपन का ज़माना था ।
एक पल में ही तक़दीरें बदल गयीं ।
हाथो़ं कि लकीरें बदल गयीं ।

कल ही तो उन्हें गले लगाया था ।
हाथों में उनके अपना हाथ थमाया था ।
फिर कैसे आज मूँद ली आँखें ?
सफ़ेद चादर में लिपटी हैं उनकी बाँहें ।

पहेलियों में पलते हैं हम ज़िंदगी की ।
रोज़ एक नए जवाब कि तलाश है ।
उफ़ ये ज़िंदगी कितनी बेहिसाब है!

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5 thoughts on “पहेलियों में पलते हैं ज़िंदगी की .

  1. OMG.. Such deep thoughts.. Good one Simran

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