खुशी के नकाब |

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Photo credits : @hyzir on instagram.

जचते हैं खुशी के नकाब इस पीढ़ी को..
ये आँसू छुपाते हैं हसी से,
और गमों को धूएं में उड़ाते हैं.
जचते हैं ये ज़िंदगी के झूठे जशन
इन्न नकाबों के रंगीन बाज़ार में.

मगर छुपते नहीं कुछ ज़ख़्म आसानी से..
किसिके प्यार की अधूरी कहानी के..
आँखों पर पट्टी बाँधे कौन चल पाता है ?
ये आँखें जो छुपाई नहीं जाती,
ये आँखें सब बयाँ कर जाती हैं.
कौन किसके गम में रोया,
और किसने जागते रातें काटी हैं..

 

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सोचा था तुम चले जाओगे तो…

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सोचा था तुम चले जाओगे
तो सब कुछ बदल जाएगा.
मगर ये सूरज,
ये तो ना उगने से थकता है
ना ढलने से डरता है.

सोचा था तुम चले जाओगे
तो ये भी मेरी तरह
बादलों की चादर में गुम,
उठने से इनकार करेगा.
मगर देखो ना,
कैसी चमकती धूप खिली है आँगन में!

सोचा था तुम चले जाओगे,
तो ये चिड़ियाँ मायूस सी,
मेरी तरह चहकना भूल जाएँगी.
शायद पेड़ो की डालियों में कही च्चिप जाएँगी.
मगर देखो ना,
ये तो नया ही कोई राग गाने लगी हैं.

सोचा था तुम चले जाओगे
तो तुम्हारे बाग़ीचे के फूल
मेरी ही तरह, तुम्हारी याद में मुरझा जाएँगे..
मगर देखो ना,
ये तो बरसात आने पर फिर खिल गये.

सोचा था तुम चले जाओगे,
तो सब कुछ बदल जाएगा..
मगर देखो ना,
सब कुछ तो दुनिया में वही है..
बस हम बदल गये.

दो पल .

दो पल की ज़िंदगी के
दो पल हमें देदो.
ना ज़्यादा ना कम,
जो है वो हमें देदो.

यूँ तो हज़ारों साल जी लें तुम्हारे बिना,
मगर बिच्छाड़ने का अगर इरादा है,
तो ये जान अभी लेलो.

चलते रहे यूँही .

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Image source : Tumblr

चलते रहे यूँही,
ज़िंदगी के पन्ने भरते हुए.

कुछ डरते हुए,
कुछ पल-पल मरते हुए.

मिलते रहे यूँही,
अपने जैसे इंसानों को.

कुछ इन्सानी भेस में राक्शस,
कुछ इंसानी भेस में भगवानों को.

पहेलियों में पलते हैं ज़िंदगी की .

पहेलियों में पलते हैं हम ज़िंदगी की ।
रोज़ एक नई राह चुनने को बेक़रार,
पीछे छोड़ आए हैं कितने ही यार ।

कुछ कुचल कर गए दिल को,
कुछ दे गए अपनी ताक़त ।
आज भी बैठे सोचते हैं ,
कैसी थी वो उनकी चाहत ।

अभी अभी तो वक़्त को मुट्ठि में थामा था ।
अभी अभी तो बचपन का ज़माना था ।
एक पल में ही तक़दीरें बदल गयीं ।
हाथो़ं कि लकीरें बदल गयीं ।

कल ही तो उन्हें गले लगाया था ।
हाथों में उनके अपना हाथ थमाया था ।
फिर कैसे आज मूँद ली आँखें ?
सफ़ेद चादर में लिपटी हैं उनकी बाँहें ।

पहेलियों में पलते हैं हम ज़िंदगी की ।
रोज़ एक नए जवाब कि तलाश है ।
उफ़ ये ज़िंदगी कितनी बेहिसाब है!

नींद से जागे हम .

नींद से जागे हम,
एक रंगीन ख्वाब में.

दिन ढले, रंग बदले,
खुली आँखों से ख्वाब बुनते रहे.

एक-एक कर , हर एक ख्वाब टूटा.
एक-एक कर, हर एक साथ छूटा.

चेहरे की रौनक ढलती गयी.
ज़िंदगी से उम्मीद घटती गयी.

लौट कर नही आए जिन्हे आना था.
ख्वाबों का टूट जाना तो एक बहाना था.

नींद के इंतेज़ार मेी फिर रंगो को भूल गये.
गहरी नींद के इंतेज़ार में,
फिर हर सपने को भूल गये.

ज़िंदगी से हार कर,
दिलों को तोड़ गये.
हम नींद से जागे थे,
नींद में खो गये.