सोचा था तुम चले जाओगे तो…

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सोचा था तुम चले जाओगे
तो सब कुछ बदल जाएगा.
मगर ये सूरज,
ये तो ना उगने से थकता है
ना ढलने से डरता है.

सोचा था तुम चले जाओगे
तो ये भी मेरी तरह
बादलों की चादर में गुम,
उठने से इनकार करेगा.
मगर देखो ना,
कैसी चमकती धूप खिली है आँगन में!

सोचा था तुम चले जाओगे,
तो ये चिड़ियाँ मायूस सी,
मेरी तरह चहकना भूल जाएँगी.
शायद पेड़ो की डालियों में कही च्चिप जाएँगी.
मगर देखो ना,
ये तो नया ही कोई राग गाने लगी हैं.

सोचा था तुम चले जाओगे
तो तुम्हारे बाग़ीचे के फूल
मेरी ही तरह, तुम्हारी याद में मुरझा जाएँगे..
मगर देखो ना,
ये तो बरसात आने पर फिर खिल गये.

सोचा था तुम चले जाओगे,
तो सब कुछ बदल जाएगा..
मगर देखो ना,
सब कुछ तो दुनिया में वही है..
बस हम बदल गये.

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दो पल .

दो पल की ज़िंदगी के
दो पल हमें देदो.
ना ज़्यादा ना कम,
जो है वो हमें देदो.

यूँ तो हज़ारों साल जी लें तुम्हारे बिना,
मगर बिच्छाड़ने का अगर इरादा है,
तो ये जान अभी लेलो.

चलते रहे यूँही .

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Image source : Tumblr

चलते रहे यूँही,
ज़िंदगी के पन्ने भरते हुए.

कुछ डरते हुए,
कुछ पल-पल मरते हुए.

मिलते रहे यूँही,
अपने जैसे इंसानों को.

कुछ इन्सानी भेस में राक्शस,
कुछ इंसानी भेस में भगवानों को.

पहेलियों में पलते हैं ज़िंदगी की .

पहेलियों में पलते हैं हम ज़िंदगी की ।
रोज़ एक नई राह चुनने को बेक़रार,
पीछे छोड़ आए हैं कितने ही यार ।

कुछ कुचल कर गए दिल को,
कुछ दे गए अपनी ताक़त ।
आज भी बैठे सोचते हैं ,
कैसी थी वो उनकी चाहत ।

अभी अभी तो वक़्त को मुट्ठि में थामा था ।
अभी अभी तो बचपन का ज़माना था ।
एक पल में ही तक़दीरें बदल गयीं ।
हाथो़ं कि लकीरें बदल गयीं ।

कल ही तो उन्हें गले लगाया था ।
हाथों में उनके अपना हाथ थमाया था ।
फिर कैसे आज मूँद ली आँखें ?
सफ़ेद चादर में लिपटी हैं उनकी बाँहें ।

पहेलियों में पलते हैं हम ज़िंदगी की ।
रोज़ एक नए जवाब कि तलाश है ।
उफ़ ये ज़िंदगी कितनी बेहिसाब है!

नींद से जागे हम .

नींद से जागे हम,
एक रंगीन ख्वाब में.

दिन ढले, रंग बदले,
खुली आँखों से ख्वाब बुनते रहे.

एक-एक कर , हर एक ख्वाब टूटा.
एक-एक कर, हर एक साथ छूटा.

चेहरे की रौनक ढलती गयी.
ज़िंदगी से उम्मीद घटती गयी.

लौट कर नही आए जिन्हे आना था.
ख्वाबों का टूट जाना तो एक बहाना था.

नींद के इंतेज़ार मेी फिर रंगो को भूल गये.
गहरी नींद के इंतेज़ार में,
फिर हर सपने को भूल गये.

ज़िंदगी से हार कर,
दिलों को तोड़ गये.
हम नींद से जागे थे,
नींद में खो गये.

वो आँखों की बातें .

आँखों से जो बातें होती थी,
वो बातें शब्दों में कहाँ!

वो नज़रों का हर दिशा में दौड़ना,
अपनी मंज़िल की तलाश मेइन.
वो मंज़िल जो बसी थी तुम्हारी आँखो में.

वो भीड़ में भी मुलाक़ातें मुकम्मल करना,
तुम्हारी आँखों की गहराइयों ओ छू कर.

वो तुम्हे देखना, और बस देखते ही रहना.

वो तुम्हारी आँखों का मेरी आँखेओं से टकराना,
और उस पल में मेरी धड़कानों का बढ़ जाना.

वो जो आँखों की बातें थी,
उन्हें आँखों में ही रहने देना.
शब्दों में ना कहना. शब्दो में ना लिखना.

अरे, वो आँखों से जो बातें होती थी,
वो बातें शब्दों में कहाँ!
बंद कर्लो उन्हें आँखों की तिजोरी में,
और जी लो उन्हें फिरसे, मेरी याद आए जहाँ.

वो लम्हें .

यूँ तो वो लम्हें गुज़र गये,
यूँही एक पल में.

आज भी उन्ही रास्तों पर चलता हूँ,
जहा हुआ करती थी मुलाक़ातें.

आज भी वाहा एक हवा का झोंका,
तुम्हारी हसी गुनगुनता है.

आज भी वो अनकही बातें,
तुम्हारी आँखों को तलाशती है.

यूँ तो वो लम्हें गुज़र गये,
यूँही एक पल में.

मगर आज भी ये साँसें,
उनकी यादों में फिर झूम जाती हैं.